Tuesday, October 16, 2007

संकलन अगले अँकों के लिये

धनंजय जी की अभिवयकतियाँ
प्रकाश

बार बार चूमा है मैंने
एक फूल,खिलने से पहले
सफ़र बीज से,जड़ शाखों तक
मेरा उसका साथ रहा है
अब वह किरणों को अर्पित है
और पिरोया सा रहता हूँ
धागों में, मैं भी प्रकाश के
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कैदखाना
कैदखाने का दरवाज़ा खुला
उसने आज़ादी महसूस की
सबकी तरह,अनजान
उस दरवाज़े से
जो सिर्फ जोड़ता है
एक कैदखाने को
दूसरे कैदखाने से



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क्षणिकाएं
शब्दों का जाल
फेंको तो है
कल्पना की झील में
देखें कब उलझती है
सोच की लहरों से बचकर
एहसास की मछलियाँ

कविता
कुछ शब्द उतरे हैं
सीढ़ियों से,
नुमाइन्दगी करने
जो अभी तक सोई पड़ी है
ऊपर वाले कमरे में
मेरे साथ
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अकेलापन
अपने अकेलेपन में भी
कितने जुड़े हुए हो मुझसे
तुम्हारे अकेलेपन के लिये
चाहिये-----------
मेरा अकेलापन
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मन्ज़िल
हम दो हैं
लेकिन मन्ज़िलें तीन
एक मेरी
एक तुम्हारी
एक हम दोनों की
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मैंने उसे देखा
सोचा,जाना,चाहा
और पाया भी
लेकिन अपनी आँखों में
मन में,दिल में
नहीं उतार पाया
उस पूरेपन को

शायद मेरा पा लेना ही
छोटा कर जाता है उसे
उसका केवल होना ही
पूरक है मेरा
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आकर्षण

कैसा आकर्षण था मुझमें
सब कुछ उलझा सा था
मेरे अस्तित्व के ताने बाने से

मन के पर्दे पर रेंगता हूँ
चाहतों का, यादों का सिलसिला
पलकों पर डगमगाता संसार
माथे पर ढुलकती सुख दुख की लड़ियां
और पैरों से चिपकी हुई सी धरती

सोचता हूँ
क्या होगा इन सबका
जिस दिन अलग होगा
मुझसे,मेरा आकर्षण


गज़ल

वीरानों में फूल खिला है
मुझमें कोई तुम जैसा है।

एकरंगी दुनियां में सबने
सतरंगी चश्मा पहना है।

ग़ैरों का कब्ज़ा है,लेकिन
लगता सब कुछ अपना सा है।

सबकी राहें अलग अलग हैं
फिर हमराह किसे कहता है।

जैसे जैसे तुम बदले हो
कुछ तो मुझमें भी बदला है।

जैसे घूंघट में चेहरा है
हर कमरे में एक कमरा है।

एक आयाम ख़्याली सा है
सब कहते हैं, ये दुनिया है
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posted

देवी नागरानी जी की चार गज़ले
गजलः १
कितने पिये है दर्द के, आंसू बताऊं क्या
ये दास्ताने-ग़म भी किसी को सुनाऊं क्या?

रिश्तों के आईने में दरारें हैं पड़ गईं
अब आईने से चेहरे को अपने छुपाऊं क्या?

दूश्मन जो आज बन गए, कल तक तो भाई थे
मजबूरियां हैं मेरी, मैं उनसे छुपाऊं क्या?

चारों तरफ से तेज़ हवाओं में हूं घिरी
इन आँधियों के बीच में दीपक जलाऊं क्या?

दीवानगी में कट गए मौसम बहार के
अब पतझड़ों के खौफ से दामन बचाऊं क्या?

साजि़श मेरे खि़लाफ मेरे दोस्तों की थी
इल्ज़ाम दुशमनों पे मैं ‘देवी’ लगाऊं क्या?
चराग़े-दिल/ २७
॰॰

गजलः २
दीवारो-दर थे, छत थी वो अच्छा मकान था
दो चार तीलियों पे ही कितना गुमान था.

जब तक कि दिल में तेरी ही यादें जवांन थीं
छोटे से एक घर में ही सारा जहान था.

शब्दों के तीर छोडे गये मुझ पे इस तरह
हर ज़ख़्म का हमारे दिल पर निशान था.

तन्हा नहीं है तू ही यहां और हैं बहुत
तेरे न मेरे सर पे कोई सायबान था.

कोई नहीं था ‘देवी’ गर्दिश में मेरे साथ
बस मैं, मिरा मुक़द्दर और आसमान था.
चराग़े-दिल/ २८
**

गजलः ११
तारों का नूर लेकर ये रात ढल रही है
दम तोड़ती हुई इक शम्अ जल रही है.

नींदों की ख्वाहिशों में रातें गुज़ारती हूं
सपनों की आस अब तक दिल में ही पल रही है.

ऐसे न डूबते हम पहले जो थाम लेते
मौजों की गोद में अब कश्ती संभल रही है.

तुम जब जुदा हुए तो सब कुछ उजड़ गया था
तुम आ गए तो दुनियां करवट बदल रही है.

इस जिंदगी में रौनक कम तो नहीं है ‘देवी’
बस इक तेरी कमी ही दिन रात खल रही है.
चराग़े-दिल/ ३७
॰॰
गजलः १२
अपने जवान हुस्न का सदक़ा उतार दे
दर्शन दे एक बार मुकद्दर संवार दे.

जो खिल उठें गुलाब मेरे दिल के बाग़ में
रब्बा, मेरे नसीब में ऐसी बहार दे.

अच्छा तो मेरे क़त्ल में मेरा ही हाथ था
आ सारी तुहमतें तू मेरे सर पे मार दे.

इक जामे-‍बेख़ुदी की है दरकार आजकल
हर ग़म को भूल जाऊँ मैं, ऐसा ख़ुमार दे.

मोहलत ज़रा सी दे मुझे लौटूं अतीत में
दो चार पल के वास्ते दुनियां संवार दे.
चराग़े-दिल/ ३८
॰॰

Geet

देवी नांगरानी
जय हिंद
१. भारत देश महान

देश की खातिर जीना शान

देश की खातिर मरना शान

जिससे कम हो शान वतन की

ऐसा कुछ भी न कर नादान.

भारत माँ है जननी मेरी

मैं उसकी लायक सँतान

कहो करूँ क्या उसको अर्पण

तन, मन, धन और मेरी जान.

जात न पात, न बोली, मज़हब

भेद न कोई, भाव यहाँ

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई

भाई भाई एक समान.

"आजादी" अधिकार हमारा

बोल तिलक ने वार किया

उसकी खातिर नेताजी ने

कर दी अपनी जाँ कुरबान.

सत्य अहिंसा, प्रेम व शाँती

गाँधीजी का था फरमान

दुनियाँ को इक मार्ग दिखाए

देश मेरा यह हिंदुस्तान.

गँगा जिसमें बहती देवी

भारत मेरा देश महान

उस मिटी का तिलक सजाऊँ

माथे पर मैं चँदन मान.

देवी नागरानी
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आज का कवि

देखता हूँ आइना जब भी,

कोई चेहरा नज़र नहीं आता

कोई पहचानता नहीं आजकल मुझको,

कोई मुझसा नज़र नहीं आता



गुमनाम नहीं होना था मुझे

और न ही अतीत में समाना था

पर खोजता हूँ तो आजकल में

मेरा वजूद नज़र नहीं आता



प्रीत की पहली नज़म मेरी लिखी हुई

अब मूरखों ने अपना ली है

आशिकी के नाम पर हर जाहिल ने

कलम पर स्याही चड़ा ली है

तुकबंदी हर पनवाड़ी के यहाँ बिकती है

हर हलवाई ने शायरों सी दाढ़ी बड़ा ली है



न अब वो गीत है, न ग़ज़लों का ज़माना है

न हुस्न में वो नजाकत है, न अब वैसा कोई दीवाना है

कौन पूछता है ग़ालिब तुझको,

मीर कौन है, क्या पता?

बच्चन तेरी मधुशाला अब कहाँ नदारद है?

अब कहाँ है वो धरम करम की बातों का मोल?

दिनकर तेरी रश्मिरथी के कृष्ण और करण कहाँ?

कुरान पुराण निज भाषा अब जाहिल ढूंडा करते है



वो ज़माना जब पंडित विद्वान सलाह दिया करते थे

है गुजर गया, बंट गया अब मिथ्या और साहित्य में

अब तो पहलवान पंच, और गुंडे शिक्षा मंत्री बनते है

ग्यानी हुआ तो क्या किया, भूखा स्कूल टीचर बना

शास्त्र जाने तो घर घर पहुँचा मंत्र पढ़ पढ़ ग्रहशांति करने

आएतें आई, तो आलिफ बे ते मुफ़्त में पढा कर

मुफ्ती की मोटी जेब में जेवर भर दिए



या फ़िर बैठा है पराये देश में, खोजता तथ्य

या अंजानो के मध्य अपनापन, अपना परिचय?

या दो शब्द जो वहम ही दे देंगे प्रगति का

या वो नाम, वो शोहरत जिसके दम पर

किसी रोज़ चंद लोग तुझे याद करेंगे



कैसा विवेक है तेरा यह दोस्त जो माया में फंसा

तलाश रहा है मिट्टी का तन , मिट्टी सा धन ,

रुक, थम, सोच, ध्यान लगा, तुझको क्या भय है

आदी-अंत, शान्ति -सम्पति, गति- अगति, अतीत-भविष्य

सब वहम है, तेरा स्वपन है,

है प्रतिबिम्ब तेरा धूमिल ही नहीं

धूल धुआं तेरा सर्वस्व है.



विवेक शर्मा का बचपन हिमाचल में बीता, आई आई टी दिल्ली से इन्जिनीरिंग करके वह २००१ में अमेरिका आए और अब वे गौर्जिया टैक, एट्लानटा से डॉक्टरेट हासिल कर रहे है. विवेक शिक्षा से वैज्ञानिक है, और इच्छा से कवि. वे हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखते हैं. रिसेअर्च और अंग्रेज़ी में उनकी रचनायें प्रकाशित होती रही हैं


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