मित्रों
संस्कृति के पहले अक में हम चर्चा करेंगे कि हिन्दी भाषा व उसकी अनिवार्यता पर लगे प्रश्न चिह्न को हटाना कितना ज़रूरी है वैसे तो सुधि पाठकगण को बताने की ज़रूरत नहीं है अपने ही देश में अपनी भाषा की क्या स्थिति है, अपने ही देश में अपनी भाषा परायी सी लगती है। हम पराये देश से अपनी भाषा के समर्थन में आवाज उठाने का प्रयास कर रहे है।
कभी-कभी लगता है बहुत सी अन्य चीज़ों की तरह हम अपनी भाषा को भी for granted ले लेते हैं। मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कोई भी ये नहीं चाहता कि अपनी भाषा लुप्त हो जाए या वे उसके बिना जी सकते हैं। सिर्फ सब लापरवाह हो गये हैं। भाषा को अपने मन में बैठाया ही नहीं।
जैसे माँ को लेकर होता है वो तो कहीं जाती नहीं न,' 'डर तो मौसी को लेकर होता है न' जो थोड़े दिनों के लिये आती है और फिर चली जाती है। पर दोस्तों मौसी को अपनाओ जरूर,पर ध्यान रहे मौसी "माँ-सी" होती है "माँ-ही" नहीं हो सकती। पर माँ को भुला देना कहाँ की अक्लमन्दी है। मुझे लगता है हम भाषा को अपने से दूर कर रहे हैं भाषा हमें नहीं।
मुझे किसी भाषा से कोई शिकायत नहीं अंग्रेज़ी से भी नहीं, पर साथ ये भी गवारा नहीं कि उसका इस्तेमाल करते२ हम अपनी भाषा को नकार दें। या फिर इसको अपनी जगह पर न रहने दें, इसके दो कारण मुझे लगता है हमने अंग्रेज़ी को स्टेटस सिम्बल बना डाला है।
सबको लगता है (खासकर बड़े शहरों में रहने वाले एक खास वर्ग को उपयोगिता की दृष्टी से अपनी भाषाएं बेकार हो गयी हैं। तो उनको ये समझना पड़ेगा देश का बड़ा वर्ग अपनी ही भाषाएं बोलता समझता है अंग्रेज़ी नहीं। इस प्रकार अँग्रेज़ी भाषा का समर्थन करके वे उस बहुत बड़े वर्ग के लिये समस्या ही खड़ी कर रहे हैं। क्योंकि हर जगह अंग्रेज़ी का इस्तेमाल होने के कारण ये लोग बहुत सारी चीज़ें पढ़ ही नही पाते, जैसे बड़े शहरों में दुकानों आदि के 'साइन बोर्ड' हर छोटी बड़ी चीज़ों के पैकेट पर लिखा नाम ,उनके विज्ञापन,या फिर दूरदर्शन पर आने वाले कार्यक्रम, फिल्में या कुछ और। ये तो कुछ उदाहरण हैं। ऐसी ही ढेर सारी चीज़ें हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता जहाँ ज़रूरी न हो वहां अंग्रेज़ी का प्रयोग न हो।
जहाँ तक हिन्दी का प्रश्न है ये एक ऐसी भाषा है जिसके रूप अने क हैं। आजकल एक हिन्दी अन्तरजाल वालों की भी प्रचलित हो रही है एक मीडिया वालों की है और फिल्मों वालों की, जिसे आदरणीय नामवरसिहं जी ने बाज़ारू हिन्दी कहा है मैं उनसे पूर्णत: सहमत हूँ मज़ेदार बात है कि इन धारावहिकों में भी जब ज्यादा असरदार संवाद बुलवाना हो तो अंग्रेज़ी आ जाती है। पर फिर भी एक बात कि खुशी है ये लोग खूब जानते हैं हिन्दी के बिना ये बेअसर हैं फिर इन्हें देखेगा कौन? नामवरसिहं जी की बात सही है हिन्दी को कोई खतरा नहीं।
विदेशों में चले आए लोगों के साथ एक बात अच्छी है। यहां आकर वो भाषा की अहमियत को अधिक समझने लगे हैं, ठीक वैसे ही जैसे यहाँ आकर वे देश के बारे में ज्यादा सोचने लगते हैं।
एक शिकायत इन माता पिता से है, वे स्वंय तो भाषा का मज़ा ले रहे हैं, पर बच्चो की कोई परवाह नहीं कर रहे, जबकि वे उनपर निर्भर हैं। भाषा का सही ज्ञान देने का दायित्व हमारा है। हमने आज न निभाया तो कल वे परेशानी में पड़ जायेंगे।
पत्रिका के इस भाग में सभी तरह की रचनायें आमंत्रित हैं हम चाहेंगे कि सभी तरह के पाठक वर्ग को इसकी भाषा सरल हो ताकि सभी तरह के पाठकों की इसमें हिस्सेदारी हो। आपके सुझाव आमंत्रित हैं
इति
शुभकामनाओं के साथ
सन्ध्या
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ज़माना
पुलीस का शिकन्जा, कुछ इस तरह ज़ालिम
बैठे-बैठे ज़ाहिद को, क़ातिल बना दिया ।।
देनें गवाही उसकी, आया गवाह उसका
वो क्या गवाही देता, उसे मुजरिम बना दिया ।।
वकीलों की जकड़ में, है गिरफ्तार क़ानून
क़ाज़ी को ही सबनें, मुल्जिम बना दिया ।।
मौलवी की मुश्किल, बयान कौन करता?
बक़रे नें आज उसको, क़ाफिर बना दिया ।।
साक़ी तेरी जवानीं, छलका रहा है जाम
दरिया का पानी तूने, सागर बना दिया ।।
डा. कुश कुमार
Thanks for the quick reply and action.
1. I do not think that I am such a big poet that my picture should be published. Poem should be enough.
2. I am a physician and working at Carl Vinson Veteran's Administration Medical Center at Dublin, Georgia as a Physical Medicine and Rehabilitation and Nuclear Medicine specialist.
3. I write just for the sake of writing. Whenever some thought comes to the mind, I try to jot it. That is all.
Sincerely,
Kush Kumar, MD
> From: sandhya.kakhaga@gmail.com
> To: kushkumar8@hotmail.com
>
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shahid
वो रात अभी तक बाकी है
ये रातें तो अब खूब कटेंगी
तुम्हें मिल कर मैं ने सोचा था
उन रौषन-रौषन आँखों में
जब सूरज सा कुछ देखा था...
जंगल,बियाबान,सुनसान थे सारी
मैंदानों में भी तन्हाई थी
नदियाँ चुप-चुप बहती थीं और
मंज़िलें अपनी अभी नहीं आयी थीं ?
फिर भी हम-तुम चल तो रहे थे
उन लम्बी घनेरी पलकों के पीछे
ख्वाब मेरे कुछ पल तो रहे थे...
ख्वाब भी कैसे-कैसे थे वो
आँखे, माथा, नाक और पलकें
बस हम-तुम जैसे जैसे थे वो
रौषन चेहरा जो मुझ पे गया था
आँखें भी तो बिलकुल मेरी ही थीं
माथे की वो चंद लकीरें..
सच सच कहो क्या मुझसी न थीं?
हाँ यूँ ही तुम्हें खुश करने को
मुस्कान तुम्हारी माँगी थी
पर हम-तुम शायद भूल गये थे...
कि जंगल में कुछ नाग भी हैं
रोती हैं मोहब्बतें जिन्हें सुनकर
जीवन में कुछ ऐसे राग भी हैं
जाना तुम तो जा भी चुकी हो
पर रात अभी भी बाकी है
लम्हा लम्हा हमने बुने वो
ख्वाब अभी भी बाकी हैं
वो रात अभी भी बाकी है
भारतीय मूल के अटलांटावासी, शाहिद सैयद , जो पेशे से सिविल इंजीनियर हैं। जार्जिया टैक से एम एस किया है।
शाहिद फिल्में बनाने का भी शौक रखते हैं। अभी हाल ही में उनकी एक छोटी
फिल्म का 'दूसरा किनारा' का मुहूरत अमेरिका के अटलांटा शहर में हुआ।
एक company में design engineer के पद पर कार्यरत हैं। सड़कें design
करते हैं। शायरी के साथ सड़के desing करने का काम काम करते हैं या
सड़कें desing करते करते शायर हो गये, ये तो वे बेहतर जाने, पर हैं वो
दोनो।
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दर्द जितना जिगर में
दर्द जितना जिगर में उतरता गया ,गीत उतने ही धुल के निखरते लगे
घाव बाहर से जितना ही भरता गया,घाव उतने ही भीतर उभरने लगे
राह जब भी रुकी चाह बढ़ती गई, कब शिलाओं ने रोका किसी धार को
नाव नाविक ने लहरों में जब दी बहा, सोचता कौन इस पार उस पार को
पास जितनी भंवर के हुई डोल कर, चप्पू उतने ही सुलझे संवरने लगे
घिर के आई घटा, घोर तम घिर गया,कसमसाई दिशायें अंधेरा हुआ
दामिनी ने दमक जो जलाया चमन फिर से दिनमान चमका उजेरा हुआ
रात जितनी गहन हो गई डूबकर, प्रात: में रंग उतने निखरने लगे
बीज मिटते गये शाख बढ़ती गई,मुस्कुराई फिज़ायें खिला फिर गगन
फूल कलियां हंसी मन की गलियाँ बसीं, फिर से महकी बहकने लगीं ये पवन
जितनी जितनी खिज़ा बदगुमान हो गई स्वप्न उतने ही मधुमय उतरने लगे
दर्द जितना जिगर में उतरता गया,गीत उतने ही धुलकर निखरने लगे
घाव बाहर से जितना भरता गया, घाव उतने ही भीतर उभरने लगे
परिचय
नाम- सुदर्शन बाहरी,उम्र ८१ बरस
बहुत सालों से लिख रही हैं भारत में लम्बे समय तक शिक्षण कार्य किया। १९९५ में पति की मृत्यु के बाद भारत छोड़ा उसके बाद अमरीका व आस्ट्रेलिया के बीच आना जाना रहा अब अमरीका में ही बेटी के पास बस गयीं हैं।
भारत की याद तो बहुत आती है वहाँ के मित्र, अपना साहित्यिक जीवन, पर अब बच्चों की वजह से विदेश में ही बस गयीं हैं। आपने हरिवंश राय बच्चन,महादेवी वर्मा,सुभद्राकुमारी चौहान जैसे लोगों के साथ कविता पाठ करने का सौभाग्य प्राप्त किया है।
सुदर्शन जी का कहना है कि चाहे कुछ भी हो जाये हिन्दी कहीं नही जाने वाली।
पर उनको इस बात का दुख: है कि अंग्रेज़ी के आधिपत्य के कारण हिन्दी वालों की बेकद्री ज़रूर होती है जिन लोगों की किताबें अंग्रेज़ी में अनुवादित हो जातीं हैं उनका नाम ऊपर आ जाता है।
उनकी इस कविता का आन्नद आप भी लें 'दर्द जितना जिगर में उतरता गया'
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पिता - पुत्र
कहा पिता नें बड़े पुत्र से जाकर बसो सघन बन में,
सौतेली माता नें तुम्हरी वचन लिया था सावन में,
मेरी मजबूरी का कन कन उसी वचन का किस्सा है,
जायजाद में नहीं तुम्हारा अब कोई भी हिस्सा है,
भाई तुम्हारा जब विदेश से एम बी ए कर आएगा,
फैक्ट्रियों बंगलों को पाकर वह कितना हर्षाएगा,
देखो मुझको ग़लत ना जानो कुछ रुपए धर देता हूं,
स्टेशन तक जाने को अपना ड्रइवर कर देता हूं,
बात मान कर पिता की बेटा घर के बाहर चला गया,
मन में लेकर भाव कि अपनों से अपना है छला गया,
बड़े शहर की भीड़ में बेटा जा वकील से टकराया,
दो ही दिन के अन्दर नोटिस कोर्ट से लम्बा भिजवाया,
तब से लेकर आज तलक वो केस कोर्ट में चलता है,
पिता पुत्र के अरमानों का महंगा दीपक जलता है,
इस कविता की खिड़की अब कुछ खुलती खुलती लगती हैं,
किसी सुनी हुई गाथा से मिलती जुलती लगती है,
यह रचना तो बस यूं ही लिखने की खातिर लिख दी है,
कलियुग के परिधानों में देखो हर वस्तु बिकती है,
सुनी हुई गाथा में लड़का केस नहीं कर सकता था,
कभी पिता के अरमानों पर ठेस नहीं कर सकता था,
सुनी हुई उस गाथा की तो हर एक बात निराली है,
सुनी हुई उस गाथा ही के दम पर आज दिवाली है।
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नामः अभिनव शुक्ल
शिक्षाः पिलानी से साफ्टवेयर सिस्टम्स में स्नातकोत्तर, बरेली से वैद्युत अभियांत्रकी में स्नातक।
प्रकाशन:
• पुस्तकः अभिनव अनुभूतियाँ (२००६), अभिमन्यु (शीघ्र प्रकाश्य)
• एलबमः हास्य दर्शन (२००५), लोटमपोट (शीघ्र संभावित)
विशेषः
• अमेरीका के २५ नगरों में आयोजित कवि सम्मेलनों का संचालन तथा काव्य पाठ।
• नई पीढ़ी के बहुप्रतिष्ठित हास्य-ओज कवि तथा व्यंग्यकार।
मेल-मिलापः shukla_abhinav@yahoo.com
वाकदूतः १-२०६-६९४-३३५३
जालघरः www.kaviabhinav.com
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Abhinav Shukla
Phone: 206-694-3353
www.kaviabhinav.com
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एक साक्षात्कार व्यक्तित्व परिचय
हिन्दी प्रेमी लोगों की कमी नहीं, हिन्दी के लिये कुछ अलग करने वाले विरले ही हैं इन्हीं में एक नाम है अनूप भार्गव जी का, जो १९८६ में अमेरिका आए यहाँ के न्यूजर्सी शहर मे रहते हैं। वैसे तो ये हैं तो 'सॉफ्ट वेयर' अभियन्ता, पर स्वभाव से हैं कवि ह्रदय । अनूप जी ने अपना एक 'अॉन लाइन' हिन्दी कविता मंच बनाया है, जो सफलतापूर्वक चल रहा है। ।आईए मज़ा लें,अनूप जी से हुई एक बातचीत का।
प्रश्न-अनूपजी आपने कविता के आदान प्रदान के लिये ये 'इलेक्ट्रानिक' माध्यम ही क्यों चुना।
अनूप- आज के समय में ये एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा दुनिया के किसी भी कोने में बैठे लोगों से आसानी से सम्पर्क किया(साधा) जा सकता है, एक दूसरे से आसानी से जुड़ा जा सकता हैं, उनका लिखा पढ़ सकते हैं किसी भी कविता पर अपनी टिप्पणी कर सकते हैं दुनिया के अलग-अलग शहरों में बैठे लोग एक साथ मिलकर कविता पाठ भी कर सकते हैं। ये ही नहीं एक दूसरे से बहुत कुछ सीख भी सकते हैं। पिछले साल हमने एक on line कवि गोष्ठी का आयोजन किया जिसमें भारत ,कनाडा ,आस्ट्रेलिया और middle east से कवियों-कवियित्रियों ने भाग लिया।
प्रश्न-कितने सालों से ये मंच चल रहा है?
अनूप-ई-कविता की स्थापना जून २००३ में हुई।
प्रश्न-कितने सदस्य हैं?
अनूप-अब तक लगभग साढ़े चार सौ सदस्य होंगे।
प्रश्न- जब आपको इसको शुरू करने की सूझी तो आपके साथ अन्य लोग भी शामिल थे?
अनूप- हाँ, राकेश खँडेलवालजी व घनश्याम गुप्ताजी शुरू से इससे जुड़े हैं। राकेश जी व्यवसाय से 'फार्मेसिस्ट' हैं और वाशिंगटन में
रहते हैं और घनश्याम जी इन्जीनियर हैं और अमेरिका के फिलाडेलफिया शहर में रहते हैं। एक तरह से कह सकते हैं हम
तीन लोगो ने मिलकर इसकी शुरुआत की।
प्रश्न-आपने नाटक, कहानी, लेख या अन्य विधाओँ को छोड़कर कविता को ही क्यों चुना?
अनूप-क्योंकि कविता में मेरी अधिक रुची थी। दूसरे कविता में आदान प्रदान होना ज्यादा आसान था।
दुनिया भर में बैठे चार सौ से अधिक लोग एक साथ कविता का मजा ले रहे हैं यानि एक
व्यक्ति कविता भेजता है तो चार सौ लोग एक साथ उसका मज़ा लेते हैं।अब तो बहुत सारे on
line संगठन हो गये हैं पर पहले ऐसा नहीं था, लोगों को कविता कहने के लिये एक मंच की
जबरदस्त दरकार था। इस मंच ने एक उद्दीपन का-सा काम किया।
प्रश्न- इस मंच को चलाते समय किसी तरह की दिक्कत भी आई?
अनूप-नहीं ऐसी कोई खास नहीं। वैसे मैने शुरू से कोशिश की कि इसको हर तरह की राजनीति से दूर
रखा जाए और न ही इसको किसी भी प्रकार के धार्मिक विवादों से दूर रखा। कविता का मंच
है, सो पूरी कोशिश है ये अच्छी भावना रखते हुऐ एक परिवार की तरह चले। मैंने पूरा तालमेल
बिठाने कि कोशिश की।कविता की आलोचना होने तक ठीक है पर कोई कवि कि आलोचना करे ऐसा
हमें बिल्कुल गवारा नहीं। ज्यादातर इस तरह के संगठनो में रचनायें संचालक (moderator ) के
पास पहले आती हैं फिर मंच पर जाती हैं पर हमारे यहां ऐसा कोई बंधन नहीं।
प्रश्न- आपका मंच पत्रिकाओं से किस प्रकार भिन्न है?
पत्रिकाएं सीमित जगह होने के कारण सीमित लोगों को ही मौका दे पाती हैं ,पर इस मंच पर हर
किसी का स्वागत होता है कोई भी अपनी कविता?गज़ल लेकर आ सकता है। इस प्रकार नये लोगों
को उभरने का मौका ही नहीं मिलता बल्कि इस प्रकार लोगों को सीखने का मौका भी मिलता है।
इसके अतिरिक्त पत्रिका उतनी जल्दी उपलब्ध नहीं हो पाती जितनी जल्दी अॉन लाइन सामग्री ।
प्रश्न-आपका ये मंच हिन्दी को आगे बढ़ाने मे किस प्रकार मददगार हो सकता है?
अनूप-कविता के माध्यम से लोग हिन्दी सुधार सकते हैं इसी माध्यम से मैंने लगभग सौ लोगों को हिन्दी
में टंकण करना सिखाया है।
प्रश्न-और किस प्रकार की गतिविधियों से आप जुड़े हुए हैं?
अनूप- हमने कई बार कवि सम्मेलन करवाये हैं और भविष्य में करवाने की योजना है।पिछले दिनों हमने
एक विशाल कविता पाठ (काव्य संगम) का आयोजन किया जो ६ घन्टे तक चला
इसमेंचारभाषाओं(हिन्दी,उर्दू,गुजराती व पंजाबी) में रचनायें पढ़ी गयीं।
प्रश्न-अमेरिका में हिन्दी शिक्षण पर कुछ कहना चाहेंगे?
अनूप-प्रयास तो बहुत हो रहे हैं और बच्चे सीख भी रहे हैं पर एक बात खटकती है हम सब अलग२
प्रयास तो कर रहे हैं। यदि ये सामूहिक हो तो शायद ज्यादा बेहतर होगा। यदि हम निश्चित
पाठ्यक्रम आदि तय कर लें तो ये ज्यादा सफलतापूर्वक चल सकता है। पढ़ाने के तरीका थोड़े रोचक
बनायें जाने चाहिये। मुझे कोई आपत्ती नहीं है यदि फिल्मों या फिल्मी गानों का भी सहारा लिया जाए।
प्रश्न-भविष्य को लेकर क्या योजनायें हैं?
अनूप-योजनायें तो बहुत हैं। on line और जगह-जगह कवि गोष्ठियाँ करने का विचार है। हमेशा प्रयास रहता है हिन्दी से जुड़ा कुछ
भी हो मदद करने को तत्पर। फिलहाल ज्यादा समय ई-कविता पर ही चला जाता है।
प्रश्न-एक प्रश्न रहरहकर मेरे मन में कौंध रहा है?आपने अपने इस मंच का नाम ई-कविता क्यों रखा? क्योंकि ये हिन्दी कविता का मंच है तो अंग्रेज़ी का खलता नहीं हिन्दी कविता या कुछ और क्यों नहीं रखा?
अनूप-इसके दो कारण हैं एक तो ये 'इलैक्ट्रानिक' पत्रिका है। दूसरे ये खुला मंच हैं हिन्दी को छोड़कर अन्य सभी भाषाओंवाले भी आमन्त्रित हैं। (अगर वे हिन्दी में अपनी कविता ला सकते हैं)
प्रश्न-संस्कृति पत्रिका के लिये कुछ कहना चाहेंगे।
अनूप- अति प्रसन्नता हो रही है इस विदेश में किसी ने पहल की है अपनी राष्ट्रभाषा में पत्रिका निकालने की। मैं इसकी सफलता के
िलये हृदय से कामना करता हूँ।
तो पाठकों ये था एक छोटा सा साक्षात्कार अनूप भार्गवजी। जो विदेश में रहकर हिन्दी को जिलाए
रखने वालों की श्रेणी की एक महबूत कड़ी हैं।
अनूपजी को पिछले साल उत्तर प्रदेश हिन्दी सँस्थान द्वारा 'प्रवासी हिन्दी प्रसार सम्मान' नामक पुरुस्कार नामक सम्मान से
सम्मानित किया गया।के लिये किये
गये योगदान के लिये सम्मानित किया जा चुका है। बधाई अनूपजी!
हम सब की शुभकामनायें आपके साथ है।
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ox item for deewali article
कहाँ है छत की मुँडेर पर वो दियों कि कतार
कहने को तो है दीपावली यानि कि दीपों की लड़ी, पर कहाँ हैं वो दियों की कतार है "क्यों नहीं होता एक साथ एक ही दिन घर घर में वैसा उजाला'।
जानती हूँ आप कहेंगे ऐसा तो नहीं ,होता तो है सही बात है होता तो बहुत कुछ है पर आपको नहीं लगता और बहुत कुछ नहीं भी होता है।
अमरीका में जो दिवाली होती है कुछ अगल तरह की है उसमें वो स्वभाविकता नज़र नहीं आती जैसी वहाँ आती थी । एक तो यहाँ हम दिवाली उस दिन मना नहीं पाते जिस दिन वो होती है ज्यादातर शनिवार या इतवार (weekend पर) को दिवाली मनाई जाती है। एक त्यौहार से ज्यादा एक समारोह जैसा माहौल ज्यादा लगता है। अलग-अलग समूह पूरे नवम्बर महीने शनिवार या रविवार का दिन चुन लेते हैं पूरे महीने कहीं पूजा तो कहीं आतिशबाजी होती रहती है। छोटे बच्चों वाले माता-पिता बच्चों को इधर-उधर लेकर भागते रहते हैं। ये सोचकर कि चलो कुछ तो हो रहा है। इस प्रकार बच्चे कुछ तो अपनी संस्कृति अपनी सभय्ता अपने संस्कारो को जानेगे। बिल्कुल सही बात है।
ये भी सही है कुछ खटकता भी है अन्दर-ही-अन्दर हमलोगों को क्यों यहाँ की दीवाली वहाँ सी नहीं हो सकती?
याद आता है दिवाली की तैयारी कई दिनों पहले से शुरू हो जाती थी। आस पास के माहौल से ही मालूम पड़ता है कि बड़ा त्यौहार आने वाला है जैसे यहां' क्रिसमस' व 'हैलोइन' के आने से पहले पता चलता है। बाज़ार रंग बिरंगे सजने शुरू हो जाते थे। मिठाईयों की दुकानों पर तरह तरह के पकवान बनने शुरू हो जाते हैं। लगभग एक हफ्ते तक लगातार त्यौहार चलते हैं। लोग घरों को सजाते हैं। खील-बताशे,दियें, रूई, मोमबत्तियाँ,आतिशबाजी
हँालाकि अब भारत में भी दीपावली का रूप- स्वरूप वह नहीं रहा जो की यादों में बसा है। अब वहाँ भी एक फर्ज़ अदायगी जैसा रह गया है। शायद रोज़ की भाग-दौड़ के कारण या फिर जीवन के बदलते स्वरूप के कारण या फिर टेलिविज़न के अत्याधिक दखल के कारण। कारण जो भी हो पर ये पूर्णतया तय है कम ज़रूर हुआ है पर लुप्त नहीं होगा।
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प्रवासी भारतीयों के अप्रवासी बच्चे
बड़ी दुविधात्मक स्थिति है विदेश में रह रहे भारतीय मूल के बच्चों की, एक शब्द पर्याय बन गया है इन बच्चों का, confuse -'confuse-confuse' ए बी सी डी !! ये बच्चे वाकई कई चीज़ों को लेकर confuse ही हैं। अमरीका में रहने वाले ये बच्चे कितनी हिन्दी जानते हैं। जानते भी हैं या नहीं क्या वो इसे मम्मी-डैडी कि भाषा मानते हैं ? बच्चों में भाषा को लेकर जो नीरसता है इसके लिये दोष किसका? ये बच्चे भारत जाकर अंग्रेज़ी का दबदबा देखकर अधिक confuse क्यों हो जात हैं?हम इस पत्रिका के माध्यम से धीरे-धीरे हर विषय पर चर्चा करने की कोशिश करेंगे, जो शायद इन बच्चों की कुछ दुविधायें सुलझा सके। ये पहला अंक भाषा को समर्पित है। अमरीका में रहने वाले कुछ बच्चों से बातचीत प्रस्तुत है।
शुरुआत करते हैं छ: वर्षीय तनिष्क जैन व तीन वर्षीय ईशान जैन से। इन बच्चों से मेरा पुराना परिचय है। जब मैं इनसे मिलने गयी और बच्चों को मेरा मिलने का उद्देशय समझ आया तो देखने वाला नज़ारा था, दोनो बच्चे कूद२ कर हिन्दी में बात कर रहे थे ।इन बच्चों का उच्चारण भाषा पर पकड़,उनकी बातों से मैं चमत्कृत थी। गलती से कोई वाक्य या शब्द अंग्रेज़ी का मुंह से निकल जाता तो तुरन्त उसी समय उसका अनुवाद करके बता रहे थे।
बड़ा तनिष्क एटलांटा में चल रहे 'हिन्दी विहार' नामक विद्यालय में 'अपर केजी' कक्षा हिन्दी सीखने जा रहा है। तनिष्क ने कहा उसे हिन्दी सीखने में मजा आ रहा है।
घर में कौन सी भाषा बोलते हो के जवाब में दोनो ज़ोर से बोले "थोड़ी सी इंग्लिश और बहुत सारी हिन्दी"
मम्मी-पापा ज्यादातर हिन्दी में बात करते हैं।
मैने पूछा हिन्दी स्कूल में क्या सीखते हो तो बोला हिन्दी और खूब सारी हिन्दी
दोनों भाई आपस में हिन्दी में बात करना पसन्द करते हैं।
बुआ जो ह्यूस्ट में रहती है से हिन्दी में बात करते हैं।
ईशान पसन्दीदा फिल्म है धूम २
और तनिष्क की my friend ganesha (उसी समय हिन्दी में अनुवाद करके बता दिया)
अब बात करते हैं मृदुभाषी कनुप्रिया की, कनुप्रिया अमरीका के न्यूजर्सी शहर में रहती है। दसवीं कक्षा में पढ़ती है।
कनुप्रिया के माता पिता हिन्दी में बात करते हैं।
कनु किसी स्कूल में हिन्दी सीखने नहीं जाती। बात कर सकती है पर लिख पढ़ नहीं पाती।
अम्मा और बाबा (दादाजी,दादीजी) जो भारत में रहते हैं, से हिन्दी में बात करती है। पूछा
बाद में हिन्दी सीखोगी तो बोली जवाब हाँ में था।
हिन्दी फिल्में देखती है।
कनुप्रिया का कहना है कि भारत जाओ तो वहाँ सारे भाई बहन english में बात करते हैं।
कनु को पता है उसके माता पिता कविता लिखते हैं।
पापा ई-कविता नाम से on line कविता मंच चलाते हैं।
आईये देखें सियाटल में रहने वाली सुरभी का क्या कहना है।
सुरभी के माता पिता महाराष्ट्र से हैं सो मातृभाषा तो मराठी है। पर क्योंकि हिन्दी राष्ट्र भाषा है सो माता पिता हिन्दी में बात भी करते हैं यानि घर पर दोनों भाषायें बोली जाती हैं।
जब सुरभी से पूछा हिन्दी बोलना अच्छा लगता है तो वो बोली मालूम नहीं। सुरभी ने बताया मां हिन्दी में न बोलने पर कभी-कभी टोकती है। सुरभी को हिन्दी फिल्में देखना अच्चा लगता है।'कल हो ना हो' और 'चक दे इण्डिया' उसको बहुत पसन्द आईं। सुरभी हिन्दी में भजन शौक से गाती है।
सुरभी के उच्चारण में थोड़ा अमेरिकी accent है। पर बातचीत से लगा वो पूरा समझती है। लिखना-पढ़ना सुरभी को नहीं आता है।
एटलांटा में रहने वाले नाथकृष्णा चेन्थावोंग की कहानी कुछ अलग है। कृष्णा की माँ शिमला भारत से हैं और पिता लाओस से हैं। लाओस में 'लाओशियन' भाषा बोली जाती है और यहाँ के लोग 'बौद्ध धर्म' को मानते हैं।
माता-पिता अमरीका में रहने के कारण अंग्रेज़ी में बात करते हैं।
नाथकृष्णा व उसकी बहन ऋषिता मेरे पास मेरे घर पर हिन्दी सीखने आते हैं।
नाथ कृष्णा को इस परिचर्चा के लिये लेने का कारण विशेष रहा क्योंकि ऐसे बच्चे "विशेष" (rare) होते हैं।
तो प्रस्तुत है कृष्णा से हुई बातचीत का एक अंश-
सात वर्षीय कृष्णा अच्छे से जानता है अपने माता पिता के अलग२ background के बारे में।
कहीं कोई दुविधा नहीं। लिखने पढ़ने में महा तेज एक बार शब्द का अर्थ बता तो दो दूसरे क्षण कृष्णा उसका जवाब दे देगा। पूरे मन से सीख रहा है। कृष्णा को हिन्दी सीखना अच्छा लगता है। उसको अपनी आंटी के साथ बहुत अच्छा लगता है। कृष्णा बड़े होने पर हिन्दी सीखना चाहता है। अगर मम्मी सन्ध्या आंटी के यहाँ लाना बन्द कर दें तो भी वो उनको जबरदस्ती लाने को कहेगा।
कृष्णा हिन्दी फिल्में भी देखता है।
कृष्णा बड़े होकर अभिनेता बनना चाहता है। कृष्णा को भारतीय संस्कृति से लगाव है। कृष्णा को पिता की मातृभाषा 'लाओशन'
भी सीखने का मन है।
कृष्णा ने बताया कि वो अपनी बहन की भी हिन्दी सीखने में मदद करता है।
राहुल और रोहण अय्यर दक्षिण भारत से हैं इनकी मातृभाषा तमिल है। तमिलभाषी होते हुए भी एटलांटा में बाल विहार हिन्दी स्कूल में हिन्दी सीखने जाते हैं। राहुल बालविहार से ग्रेजुएट हो चुका है और रोहण चौथी कक्षा में पढ़ता है।
राहुल चौदह साल का है। मम्मी पापा के जबरदस्ती करने पर बालविहार गया। जब राहुल से पूछा उसे क्या लगता है हिन्दी सीखने माता पिता ने क्यों भेजा तो उसका जवाब था क्योंकिcollege में credit मिलता है इसलिये।
कभी२ बालविहार जाने पर बहुत गुस्सा आता था।
राहुल को लगता है लिखने और पढ़ने की तुलना में बोलने वाला पक्ष ज्यादा मुश्किल है। राहुल को मालुम है भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है।
जब राहुल से ये पूछा क्योंकि अब वो बाल विहार से ग्रेजुएट हो चुका है तो अब हिन्दी पढ़ता है तो वो बोला, नहीं। हाँ हिन्दी फिल्में देखता है।
राहुल के भाई रोहण का कहना है। घर में ज्यादा तमिल बोलते हैं। बारह वर्षीय रोहण को राष्ट्रभाषा मतलब पता है। भारत हर साल जाना पसन्द नहीं हैं।
रोहण बाल विहार से अपना ग्रेजुएशन पूरा करना चाहता है। रोहण sports person या डाक्टर बनाना चाहता है।
रोहण ने कहा माता पिता हिन्दी learn करने कि इसलिये कहते हैं उसी के शब्दों में "' क्योंकि ये india के national language है।"
पर जब लोग पार्टीज़ में हिन्दी बोलते हैं तो समझ में नहीं आता।
रोहण को भी कभी२ बालविहार जाने पर गुस्सा आता है।
राहुल व रोहण दोनो ही ये मानते है कि भाषा के माध्यम से हम संस्कृति से अधिक जुड़ते हैं।
तो मित्रों ये तो थी एक छोटी सी परिचर्चा 'बच्चों नज़रिये से-'- आने वाले अंकों में हम माता पिता व शिक्षकों का पक्ष भी रखेंगे।
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अब फिज़ाओं में महक रही है हिंदी भाषा
विश्व का मँच मिला हिंदी का
घर घर में अब हिंदी बोलो
रात की रानी जैसे महकी
हिंदी भाषा फिज़ा में घोलो... देवी नागरानी--
हिंदी का नया सूर्योदय नज़र आ रहा है. ८वें विश्व हिंदी सम्मेलन के शिखर पर एक सुन्हरा दरवाज़ा UNO में भारतवासियों के लिये खुला है, उसका इतिहास गवाह है. सम्मेलन का मूल मक्सद ही यही है कि हिंदी को विश्व मंच पर स्थापित करना. तमाम देशों से आए हिंदी प्रेमी संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय के कान्फ्रेंस हाल में दाखिल हुए तो अहसास हुआ UNO ने खुले दरवाजों ने हिंदुस्तानियों का सन्मानित स्वागत किया है. यहाँ गाँधी जी का कथन सत्य बनकर सामने आया " अपने दरवाज़े खुले रखो, विकास अंदर आएगा,"
और यह दिन एक ऐतिहासिक यादगार रहेगा.वह दिन दूर नहीं जब संयुक्त राष्ट्र संघ हिंदी भाषा को भी अपने आलंगन में ले लगा. संयुक्त राष्ट्र संग की भाषा बनाने का प्रयास सफलता की सीडियाँ चढता जहां पहुंचा है वहां पर मुकाम पाने की संभावना रौशन नज़र आती है. किसी भी भाषा का साहित्य उस भाषा का वैभव है. हर देश की तरक्की उसकी भाषा की तरक्की से जुड़ी होती है.
मानव मन की वाणी हिंदी
आदि वेद की वाणी हिंदी.
"प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी"
डा॰ अजना संधीर जिसकी मुख्य कार्यकर्ता रही, वहां प्रदर्शित तस्वीरें , बैनर्स, व सजावट में साथ दिया डा॰ सरिता रानी ने. जिन्होंने अपने सहयोग साथियों की मदद से किताबों की सजवट और बिक्रि का बार बखूबी स्भाला.
हिंदी के प्रवासी साहित्यकारों की लिखी २७० पुस्तकें वहां प्रदर्शित रहीं, किकाबों की सूची भी सबको दी जा रही थी. एक प्रतिक्रिया के लिये डायरी रखी गई थी जिसमें, कई साहित्यकारों ने, संपादकों ने और साहित्य प्रेमियों ने सराहना के शब्द लिखे जिससे लेखकों में नई शक्ति का सँचार होने की संभावना रहेगी. कुछ मैं यहां उल्लेख करना चाहूगीं महिलाओं के इस सँगठित कार्य के बारे में.
प्रवासी साहित्य की मुख्य कार्यकर्ता डा॰ अंजना संधीर विदेश राज्य मंत्री श्री आँनंद शर्मा का प्रदर्शनी में स्वागत किया. उन्होंने उत्साह से पुस्तकों पर अपनी पारखी नज़र डालते हुए कहा " यह एक सुखद प्रयास है जो सेतू का काम कर रही है. उस प्रवासी हिंदी धारा को लेकर हिंदी की मुख्य धारा से जोड़कर एक मुकमिल कदम उठा सकते हैं जिसे भाषा को पुख़्तगी मिल सके और एक महासागर का स्वरूप प्राप्त कर हो सके. साहित्य के माध्यम से ही हम एक दूसरे से जुड़ सकते है.
" प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी" का निरीक्षण सुबह हुआ और उसी शाम अपने हाथों से २२ प्रवासी लेखक और लेखिकाओं की उपस्थिति में ३७ पुस्तकों का विमोचन किया जिसमें मेरा "चराग- दिल" भी शामिल था.
१४ तारीख को डा॰ गिरिजा व्यास ने भी काफी समय तक पुस्तकों का निरीक्षण किया संकेत यही मिलता है कि सिमटाव का कवच उतारकर अपने आपको फैलाने का वक्त आया है.
बाल साहित्य के अध्यक्ष श्री बालशौर रेड्डी ने अपनी प्रतिक्रिया में संक्षेप में बताते हुए कहा " बाल साहित्य के सूत्रों से आपका कहने सुनने का नाता है, था और चलता रहेगा. टिमटिमाते सितारे, पानी में मछली, , जिग्यासा भरे प्रश्न उत्पन करती है, प्रश्न उत्तर की चाहत रखता है, बस बाल मन समझने की जरूरत है, प्दर्शनी की सराहना करते हुए कहा " यह कोई साधारण काम नहीं हैं. लगन ओर मेहनत रंग लाई है" १३ जूलाई २००७
सयुंक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने मंच पर अपने विचार जनता के सामने रखते हुए कहा "हिंदी भाषा जनता की भाषा है, इसका शिक्षण, परिक्षण, शोध, अनुशोध ज़रूरी है. शब्दावली का विस्तार हो शब्द कोष समर्थ हो यही सफलता की सीडी का पहला पड़ाव है. प्रदर्शनी में जब वह पधारी तो मैंने अपना गज़ल संग्रह " चरागे दिल " उन्हें भेंट करते हूए कहा कि आप शेर अच्छे बोल लेती हैं, उसे जरूर पढ़ियेगा" तो तैरती नज़र किताब पर डालते हुए कहा " इतना आकर आकर्षक कवर है, इसे जरूर ले जाऊँगी और पढूँगी।" प्रदर्शनी को करीब से देखते हुए अनायास राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डा॰ गिरिजा व्यास ने कहा "भाषा के माध्यम से हर क्षेत्र में उन्नति प्राप्त करनी है और लेखक ही सिर्फ दिशा दिखा सकते है अपनी कलम के जोर पर. हिंदी भाषा नहीं है, एक प्रतीक है, भारत की पहचान है, हिंदी को बढावा मिल रहा है, यह हिंदुस्तानियों की मेहनत है. अनेक भाषाओं के आदान प्रदान से हमारी संस्क्रुति पहचानी जाती है. देश की तरक्की उस की भाषा से जुड़ी हुई होती है. इसमें बड़ा हाथ साहित्य कारों, लेखकों, संपादकों और मीडिया का है."
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देवनागरी लिपि के अध्यक्ष श्री बालकवि बैरागी "प्रवासी पुस्तक प्रदर्शनी" के दौरान. उसे बहुत सराहा और सभी लेखकों को मुबारकबाद देते हूए अंजना के इस कार्य की सराहना करते हुए कहा वे तो शारदा सुता हैं "
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श्री गौतम कपूर ने प्रदर्शनी को देखते हुए कहा "अंजना व समस्थ साथियों, जिन्होंने अपनी क्रतुयों के सशक्त माधंयम से इस प्रदर्शिनी को एक नया रूप दिया है, उन सभीको मेरा शत शत प्रणाम. मुझे यह देखकर एक सुखद आश्चर्य की अनुभूति का अहसास है जो मेरे रोम रोम को खिलित कर रही है कि अपने देश से हज़ारों मील दूर, प्देश में मेरे देश के लोग वहां की भाषा को पुस्तकों के माध्यम से भारत की संस्क्रुति विश्व भर में प्रचारित कर रहे हैं." गौतम कपूर, १४ जूलाई २००७.
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कमलकिशोर गोयानका जी ने अपने मन के भाव व्यक्त करने में कोई " यह प्रद्रशनी देखना एक सौभाग्य का विषय है. यह अमरिका के हिंदी लेखकों की रच्नात्मकता का एक अत्यात परिद्रिश्य का उद्घाटन करती है ." कमल किशोर गोयनका. १५जूलाई, २००७
हां ये और बात है कि विचारों के आदान प्रदान के बीच में मत भेद भी होगा, सवाल होंगे जिनका जवाब पाना मुशकिल होगा.पर मेरा अपना विचार है कार्य का सिलसिला चलता रहे, देश की भाषा उसकी संस्क्रुति, प्रवासी देशों से जुडती रहे तभी तो जाकर हम एक स्तर पर मिलजुल कर कुछ कार्य इस दिशा में कर पाएंगे. जब तक कलम तलवार का काम
नहीं करेंगी, अपनी नोक से लेखक, साहित्यकार, जनता की सोच, उनकी बात, उनके इरादे लेखन द्वारा आम जनता तक नहीं पहुंचाएंगे, तब तक संगठन बन नहीं सकता., इरादों में पुख्तगी व बुलंदी आ नहीं सकती. लक्ष्य एक है मंजिल एक है, तो राह भी एक ही बनानी पड़ेगी, और यह है अपनी देश की मात्र भाषा को घर घर तक लाने का संकल्प जो किया है उसे अपनी मंजिल तक पहुंचाये.
देश की भाषा देश में मज़बूत रहेगी तो तब जाकर वह विदेश में पनप पायेगी, और तब ही मात्रभाषा से राष्ट्र भाषा बनेगी. देश की भाषा विदेश तक पहुंचे, यह हमारी परीक्षा है, कहाँ तक हम निभा पाते हैं, कितना सींच पाते है इसे अपना व्यहवार से, दुलार से ताकि इसकी जडों में पुख्तगी आ सके, और यह लोरी बनकर देश , प्रवासी देश के घर घर में जहां एक हिंदुस्तानी का दिल धडकता है, वहां गूज बन कर फिज़ाओं में फैलती रहे, जिसका विस्तार आकाश की बुलंदियों से ऊँचा हो. जय हिंद.
Adapted by: Devi Nangrani
devi1941@yahoo.com
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११ मई १९४१, कराची ( पाकिस्तान) में जन्मी भारतीय मूल की कवियित्री -
देवी बी. नागराणी. स्थाई निवास तो मुम्बई है, पर अब अपने परिवार सहित न्यूजर्सी में रहती है और अध्यापिका है. आप मूलतः सिंधी भाषा की साहित्यकार हैं लेकिन हिंदी भाषा पर भी आपकी मज़बूत पकड़ है. गत अनेक वर्षों में हिंदी में आपकी कविताएं, गज़लें, कहानियाँ भारत के अनेक पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही हैं. अमिरीका में इन्टरनेट पर अनेक ग्रूप और कवि सम्मेलनों में भाग लेती रही हैं. नागरानी जी काफी अंतरमुखी रचनाकार है, वे चाहें गज़ल कहें, कविता अथवा कहानी लिखें, हर कहीं अपने परिवेश की तस्वीर को पेश करने में ईमानदार कोशिश करती है.
आपके की तीन संग्ह प्रकाशित हुए हैः
ग़म में भीगी खुशी (सिंधी गज़ल संग्रह २००४)
उड़ जा पँछी ( सिंधी भजन संग्रह २००७)
चराग़े-दिल ( हिंदी गज़ल संग्रह २००७)
आपका मुम्बई का पता हैः
देवी नागरानी
९..डी, कार्नर व्यू सोसाइटी, १५/३३ रोड,
बाँद्रा, मुंबई ४००५०
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Monday, October 22, 2007
Introduction Bindu chauhan
बिन्दु चौहान शादी के बाद लगभग आठ साल पहले भारत से अटलाँटा आईं। मुम्बई से बी कॉम किया है। अटलाँटा आने से पहले भारत में एक कम्पनी में कार्यरत थीं।
बिन्दु को नाचने का व नये-नये व्यंजन बनाने का शौक है।
१ चटपटा ट्रौटिया चिड़वा-
सामग्री-१० तैयार ट्रौटियाज़ (guerrero Brand)
एक छोटा चम्मच जीरा , करी पत्ता की १५-२० पत्तियाँ, आधा कटोरी ,मूँगफली, २हरी
मिर्च ,१/२ चम्मच चीनी,नमक स्वादानुसार,२बड़े चम्म्च तेल ट्रौटियाज़ को तलने के लिये
विधि-ट्रोटियाज़ के छोटे२ टुकड़े काटकर, तेल में तल लें। तलने के बाद ट्रौटियाज़ को हाथ से
मसलकर चूरा बना लें।
एक कड़ाई में दो चम्मच तेल डाल कर गर्म करें। गर्म तेल में जीरा,कटी हुई हरी मिर्च, करी
पत्ता और मूँगफली डालें। मूँगफली जब भूरी होने लगे तो इसमें ट्रौटिया का चूरा मिला दें।
अब इसमें स्वादानुसार नमक व आधा चम्मच चीनी मिला दें। चीनी मिलाने के बाद गैस को ब
बन्द कर दें। सभी चीज़ों को अच्छी तरह मिलायें। लीजिये खाने को मज़ेदार चिड़वा तैयार है।
गरमागर्म चाए के साथ इस चिड़वे का आन्नद लें।
२ आसान नमकपारे
सामग्री- कॉर्न ट्रौटियाज़ ५ या अधिक भी ले सकतीं हैं। चाट मसाला,तेल (तलने के लिये)
विधी- सबसे पहले ट्रौटियाज़ को चौकोर (आप किसी भी आकार में काट सकतीं हैं) टुकड़ों में
काट लें। काटने के बाद इनको तल लेंतलने के बाद इनको एक पेपर टावल पर फैला दें
ताकि तेल पेपर सोख ले। अब इनपर चाट मसाला बुरक दें, आसान खाने में मज़ेदार
चटपटा नमकीन तैयार।
नोट- आप चाहें तो इन तले हुए टुकडों को चाट पापड़ी में पापड़ी की जगह प्रयोग कर सकती
हैं।
३ ट्रोटिया-भटूरे
सामग्री-ट्रोटियाज़ को तल कर आप भटूरे भी तैयार कर सकतीं हैं। बाज़ार से guerrero
brand के ready to cook ट्रोटिया लायें। ट्रोटियाज़ को दो या चार हिस्सों में काट
कर गर्म तेल में तल ले,तेल में डालते ही ये पूरी की तरह फूल जायेंगे। चने तैयार कीजिए
चने भटूरों का मज़ा उठायें।
४ ट्रोटिया रोटियाँ
ये भी करके देखें, ट्रोटिया को सीधे आंच पर फुलायें एक दम रोटी की तरह फूल जायेगी।
सब्ज़ियाँ अपनी रोटियाँ मैक्सिकी,खाने का मज़ा भी दोहरा, क्या कहने।
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'किस्सा पुराना पर समस्या नयी सी'
लगभा ३५ साल पहले
दिल्ली विश्वविद्यालय के मशहूर कॉलेज मिरांडा हाऊस के बाहर एक दक्षिण भारतीय लड़की ने ठेलेवाले से 'आईसक्रीम' ली। आईसक्रीम वाला' बचे पैसे वापिस देना भूल गया।लड़की हैरान परेशान खड़ी थी, भाषा की समस्या थी पैसे माँगे तो कैसे? 'आईसक्रीम वाले' के पास भीड़ बहुत थी। लोग आ रहे थे 'आईसक्रीम' ले के वापिस जा रहे थे। विकट समस्या थी बेचारी करती भी तो क्या करती?
बहुत बार इशारों से समझाने की कोशिश की , पर बात न बनी। उसको हिन्दी और संस्कृत का अल्प ज्ञान था। लड़की ने मन ही मन भाषा का गणित बैठाया । बहुत सोचने-विचारने के बाद चिल्लाकर बोली "हे पुरुष धन दे"
मैं अमेरिका के टारगेट स्टोर में काम करती हूँ। एक दिन मेरे पास एक अमेरिकी महिला अपने दो बच्चों
के साथ आई उसके बच्चे बघ्घी में (shopping cart) में बैठे थे और बहुत उछल कूद कर रहे थे।
माँ ने चिल्ला कर कहा sit down pumpkins। मुझे हंसी आ गयी मैंने कहा कि पता है हमारी भाषा मेंpumpkin को क क्या कहते हैं "कद्दू"।
बच्चे फिर भी बाज न आए माँ परेशान थी। थोड़ी देर तक तो औरत चुप रही ,फिर मस्ती भरे लहज़े में चिल्लाकर बोली 'sit down kaddus' (खद्दूज़)
बागवानी जरूर करें
ऐसी कभी न करें
कुछ नुस्के
जब हम पहली बार अमरीका आए तो देखा यहाँ गाजरों का रंग संतरी होता है दिल्ली में जो गाजरें होतीं हैं वो ज्यादातर लाल रंग की होतीं हैं । बहुत मन हुआ काश के यहाँ भी लाल गाजरों से बने हलवे का मजा ले पाते।तो साहब बस अगली भारत यात्रा के दौरान लाल गाजरों के कुछ बीज ले आए। बहुत चाव से ज़मीन में रोपा गया। इंतज़ार हुआ गाजरों के बड़े होने का, सब कुछ ठीक चल रहा था यहाँ तक।
अब समय आ गया था गाजरों को तोड़ कर खाने का। क्या बात है मिट्टी के रंगो की तो साहब हमारी गाजरों का रंग लाल न होकर संतरी था।
कब तक भटकेगा ऐ राही
अब तो दिशाओँ को अपनी ढूँढ ले
रंग तो घास का हरा ही होता है
ये तो मिट्टी है जिसके रंग निराले हैं
जो अपनी जड़ों से उखड़ते हैं
मुरझा जाते हैं
पनपता तो वही है जो
नयी मिट्टी के रंग में रंग जाता है
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